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रोपा गीत, खोरठा पंचम महतो khortha ropa geet pancham mahto

खोरठा साहित्यकार: पंचम महतो 
खोरठा रोपा गीत 
सावन महिनवां झिमिर झिमिर पत्नियां,
चला बहिन धान रोपे जाइब।
संइया हामर कांदा करले,
देवरा करलइ कोदाइर।
झपटी झपटी बिहिन मारवइ,
धनवां रोपबइ गाता झाइर।
तीनो गोतनी मिलि रोपलों धनवां, 
आंठे दिने गेलइ हरियाय।
देखि हरखल ससुर के मनवां,
भेंसुर के मन में बहार।
सासे कहली बहु पाके दे धनवां,
पंजनियां देबो गरहाय।
अगहन महिना पाकलइ धनवां
पुरन भेलइ भांडार।
संइयां आनल लाल पियर सडिया,
सेहो पिंधि मेला घुरे जाइब।
संइया के हाथ धरी घुरब मेलवा,
आनंदे दिना बिताइब।
सावन महिना झिमिर झिमिर पनियां
चला बहिन धान रोपे जाइब।